Kavita / Poem · Hindi, urdu
पैग़ाम
पैग़ाम
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एक और अँधेरी रात में
जब मेरे साथ बस मेरी कलम
रहती है, और यादों की
लुका-छिपी मेरे मन में चल रही होती है,
तो न जाने किस गहरे कुएँ से
ये ख़्याल निकल आते हैं कभी-कभी
कि क्या हुआ होगा उन रिश्तों का
जो ज़िंदगी की भाग-दौड़ में
कहीं पीछे छूट गए,
और हम कहीं आगे आ गए?
और हैरानी तो इस बात की है
कि अभी ज़िंदगी की इस दौड़ में तो
कहीं बीच में ही हैं हम,
पर वो रिश्ते सारे हार गए।
क्या होता होगा उन संदेशों का
जो कभी भेजे गए थे हमें,
और हमने वादा किया था कि
कुछ भी हो जाए ज़िंदगी में हमारी,
हम हमेशा उन्हें उत्तर देंगे,
हम हमेशा उन्हें बताते रहेंगे
कि कोई हो न हो उनके साथ,
हम हैं, चाहे फिर उस समय
हम ख़ुद के साथ भी न हों।
क्या उन संदेशों को कभी
उत्तर मिला?
या फिर वो भी
बस उम्मीद लगा कर
बैठे रहे और एक दिन,
इंतज़ार करके
अपने दो ब्लू टिक का तमगा लेकर
ख़ामोश हो गए?
क्या रिश्ते टूट जाते हैं इतनी आसानी से?
क्या हार जाते हैं मात्र एक 'Seen' से?
क्या छोड़ देते हैं उम्मीद
फिर कभी उत्तर पाने की?
क्या दो इंसानों को जोड़ने वाली ये डोर
होती है एक इंसान से भी कमज़ोर?
कैसा सवाल है ये भला?
ख़ुद के रिश्तों की ही
जब करता हूँ छान-बीन,
तो पता चलता है मुझे
कि कितने ही संदेश ऐसे,
कितनों के अनदेखे किए हैं मैंने।
दुःख होता है ये सोच कर
कि किस हालत में, किस तकलीफ़ में,
किस वजह से भेजे थे वो सारे संदेश मुझे,
और मैं अपनी ज़िंदगी में इतना गुम था
कि नहीं निकाल पाया समय
उन लोगों के लिए, जिनको
कभी किया था वादा
कि रहूँगा साथ में
हर दम, हर वक़्त,
बस एक मैसेज दूर।
अब जब कभी पहुँच जाता हूँ
वापिस अपने फ़ोन की उन गलियों में,
और देखता हूँ उनका नाम
टिमटिमाता सा,
तो सोचता हूँ कि क्या हो गई बहुत देर?
क्या अब ये हमारे बीच की खाई
नहीं भर पाएगी फिर एक
"Hi" से?
क्या फिर से नहीं पूछ सकता हूँ मैं
हाल-चाल उनके? फिर से कर सकता हूँ
क्या वादा कि हूँ मैं साथ उनके,
हूँ अभी भी यहीं,
बस भटक गया था कहीं?
और नहीं माँग सकता माफ़ी क्या
एक बार?
पर फिर याद आता है
कि ये बात थी कितने ज़माने पहले की,
और अब सिर्फ़ किया जा सकता है
एक ही काम
कि देखता रहूँ
अपने फ़ोन की स्क्रीन,
और सोचता रहूँ
कि माँग लूँ माफ़ी तो सब हो जाएगा
क्या ठीक फिर से?
मिल जाएँगे ये लोग फिर से?
मिल जाऊँगा मैं फिर ख़ुद से?
मिल जाऊँगा क्या?
~
शिवम गुप्ता©