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Stories to carry home.

Poetry, shayari and stories by artists and writers connected with Kala Manch Studio.

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Chosen by the community

Shivam Gupta

Ghazal / Sher · हिंदी, उर्दू

Featured

न जाने ये कैसे छुपाई हुई है

न जाने ये कैसे छुपाई हुई है उदासी जो अंदर समाई हुई है इशारों से जिसके ये दुनिया है डरती वो अपने पति की सताई हुई है जो रक्खी है मैंने सभी से छिपा कर वो फोटो नशे में जलाई हुई है कहाँ ही मिलेंगे तुम्हें मेरे जैसे ये बदनामी मेरी कमाई हुई है लगी है वो याद आने ज़्यादा ही मुझको मेरी बेटी जब से पराई हुई है। जहाँ का मजा तो उसी ने लिया है यूँ बचपन में जिसकी पिटाई हुई है। ~ शिवम गुप्ता©

Pulkit Agrawal

Kavita / Poem · Hindi

Featured

याद तुम्हारी आती है

सावन की हर बारिश में, जब बिजलियां तड़तड़ती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है | टप टप बारिश की बूंदे जब, मेरे कानों में आती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है | पहली बारिश की भीगी मिट्टी, जब भी खुशबू में खाती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है | छम छम बारिश के रोग में जब मोरनी नाचे आती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है | जब भी यह बारिश आती है, यह ताना में कर जाती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है |

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Artists' work

Ghazals, poems & stories

Shivam Gupta

Ghazal / Sher · हिंदी, उर्दू

Featured

न जाने ये कैसे छुपाई हुई है

न जाने ये कैसे छुपाई हुई है उदासी जो अंदर समाई हुई है इशारों से जिसके ये दुनिया है डरती वो अपने पति की सताई हुई है जो रक्खी है मैंने सभी से छिपा कर वो फोटो नशे में जलाई हुई है कहाँ ही मिलेंगे तुम्हें मेरे जैसे ये बदनामी मेरी कमाई हुई है लगी है वो याद आने ज़्यादा ही मुझको मेरी बेटी जब से पराई हुई है। जहाँ का मजा तो उसी ने लिया है यूँ बचपन में जिसकी पिटाई हुई है। ~ शिवम गुप्ता©

Pulkit Agrawal

Kavita / Poem · Hindi

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याद तुम्हारी आती है

सावन की हर बारिश में, जब बिजलियां तड़तड़ती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है | टप टप बारिश की बूंदे जब, मेरे कानों में आती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है | पहली बारिश की भीगी मिट्टी, जब भी खुशबू में खाती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है | छम छम बारिश के रोग में जब मोरनी नाचे आती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है | जब भी यह बारिश आती है, यह ताना में कर जाती है, उस समय अकेलेपन में, मुझे याद तुम्हारी आती है |

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Nitin Mohan

Ghazal / Sher

जिंदगी का बस इतना सा फलसफा होता है

जिंदगी का बस इतना सा फलसफा होता है गिरना उठना यहां सबको कई दफा होता है मोहब्बतें मैने उन पर बहुत लुटाई है पर शायद वो अभी मुझसे ही खफ़ा होता है कोई नाराज सा है मुझसे क्या करूँ बताओ ठीक है ये माजरा कौन सा इक दफा होता है आया गया कोई तो कहीं कोई रुस्वा है मुस्कुराके जीने में एक अलग मज़ा होता है यकी मेरा के मिलेगी मंजिल आसमाँ झुकेगा सबके हाथों की लकीरों में भी लिखा होता है

Nitin Mohan

Ghazal / Sher

एक्स की याद अब उतनी आती नही

एक्स की याद अब उतनी आती नही आती है जो कभी फिर ये जाती नही इश्क़ उनसे है कितना जताता अगर याद उसकी कभी फिर सताती नही जान जाती अगर वो इरादे सभी बाबू सोना वो मुझको बनाती नही सीध सादी लगी थी मगर थी नही काट कर वरना मेरा यूँ जाती नही कुछ न कुछ तो रहा उससे रिश्ता मेरा प्रेम के गीत फिर गुन गुनाती नही

Nitin Mohan

Kavita / Poem

मोहब्बत

नाम उसका है मोहब्बत, काम उसका है मोहब्बत जब से देखा है उसे तो, हो गई मुझको मोहब्बत वो भी क्या मंज़र हुआ जब, आई वो मेरे शहर में हो गया था मैं भी पागल, देख के पहली नजर में रात उसकी दिन भी उसका, चाँद उसका नूर उसका उस पे उसका मुस्कुराना, था बड़ा मशहूर उसका सादगी उसकी थी ऐसी, कोई देखा ख़्वाब जैसे रूप उसका लग रहा था, सामने महताब जैसे उसकी जुल्फे उसके गेसू उसकी पलके उसकी पायल उसके झुमके उसका कंगना कर गया मुझको तो घायल उसकी आँखों में नशा था उसकी बातों में असर था वो हँसे तो फूल खिलते वो चले शाम-ओ-सहर था उसकी ज़ुल्फ़ों की घटा में खो गया दिल इस क़दर फिर उसकी इक मुस्कान पर तो, मैंने अपना दिल दिया धर लिखते हो जैसे की शायर उसकी बातों को ग़ज़ल सा उठती पलकें उसकी मानो खिलता हो कोई कँवल सा आहटें कदमो की उस की गीत बन आती थी जैसे वो गुज़र जाए जो छूके साँस रुक जाती थी जैसे उसके चेहरे की चमक से चाँद भी शरमा गया था उसकी भोली सी अदा पर दिल मेरा फिर आ गया था वो जो देखे प्यार से तो रुक सी जाती थी नज़र ये उसके होने से ही जैसे ख़ूबसूरत था शहर ये उसका आना था बहारों का कोई पैग़ाम जैसे उसका जाना छोड़ जाए, दिल में कोई शाम जैसे वो रहे तो ज़िंदगी में, हर तरफ़ त्यौहार होता और वो बस मुस्कुरा दे, फिर मुझे क्या खूब लगता उसको देखें उसको चाहें ,मेरी नज़रें मिलना चाहें दिन तो बस दफ्तर मे कटता, रात को भरता मैं आँहे कर के हिम्मत एक दिन मैंने बताया है मोहब्बत कर दिया उसने मना यूँ मैं किसी की हूँ अमानत पढ़ के मेरे खत वो बोली, मै भी करती थी मोहब्बत हो गयी थी जाने जाना, तब मुझे तुमसे मोहब्बत पास आके मेरे बैठी आँखें चूमी हाथ थामा था मेरा जो ये दिवाना मर गया करके मोहब्बत

Nitin Mohan

Ghazal / Sher

खुदा का दिया था हवाला मुझे

खुदा का दिया था हवाला मुझे दिया हाथ में जिसने प्याला मुझे वो बैठा रहा लाशों के ढेर पे दिखाया नहीं सच ये काला मुझे बहुत बात होती थी उसकी वहाँ लगा झूठ सब बोलबाला मुझे खबर तक नहीं दी उन्होंने मुझे कि उसने जो दिल से निकाला मुझे अंधेरो करो मुझ से अब दोस्ती बहुत चुभ रहा है उजाला मुझे ज़माने से सीखा अनोखा हुनर सिखा ना सकी पाठशाला मुझे

Nitin Mohan

Ghazal / Sher

शिकायत कैसे होती है शिकायत करके देखेंगे

शिकायत कैसे होती है शिकायत करके देखेंगे तजुर्बा होता है जो भी मोहब्बत करके देखेंगे सुना है वो हैं करते सौदा सबसे चाहतों का तो तिजारत कैसे होती है तिजारत करके देखेंगे नहीं आता है हमको सहते जाना दर्द ए आज़ारी बगावत कैसे होती है बगावत करके देखेंगे

Nitin Mohan

Nazm

सुकून

रोज यूँ ही जागता हूँ आजकल मैं रातों में ना जाने ही किन ख़यालों में किन बातों में मुझे इक अरसा हुआ है चैन से सोये हुए रंगी रातों के हसीन सपने में खोये हुए एक बार फिर वही नींद आ जाये गुजारिश है सुनो कहाँ हो तुम बिन जिंदगी लावारिस है बस अब और नही जिंदगी तुम आ भी जाओ एक बार फिर मुझे उसी नींद सुला भी जाओ इक एहसान जिंदगी ये तू मुझपे कर दे बचपन वाले सुकू से मेरी झोली भर दे

Shivam Gupta

Kavita / Poem · Hindi, urdu

पैग़ाम

पैग़ाम . . एक और अँधेरी रात में जब मेरे साथ बस मेरी कलम रहती है, और यादों की लुका-छिपी मेरे मन में चल रही होती है, तो न जाने किस गहरे कुएँ से ये ख़्याल निकल आते हैं कभी-कभी कि क्या हुआ होगा उन रिश्तों का जो ज़िंदगी की भाग-दौड़ में कहीं पीछे छूट गए, और हम कहीं आगे आ गए? और हैरानी तो इस बात की है कि अभी ज़िंदगी की इस दौड़ में तो कहीं बीच में ही हैं हम, पर वो रिश्ते सारे हार गए। ​क्या होता होगा उन संदेशों का जो कभी भेजे गए थे हमें, और हमने वादा किया था कि कुछ भी हो जाए ज़िंदगी में हमारी, हम हमेशा उन्हें उत्तर देंगे, हम हमेशा उन्हें बताते रहेंगे कि कोई हो न हो उनके साथ, हम हैं, चाहे फिर उस समय हम ख़ुद के साथ भी न हों। ​क्या उन संदेशों को कभी उत्तर मिला? या फिर वो भी बस उम्मीद लगा कर बैठे रहे और एक दिन, इंतज़ार करके अपने दो ब्लू टिक का तमगा लेकर ख़ामोश हो गए? ​क्या रिश्ते टूट जाते हैं इतनी आसानी से? क्या हार जाते हैं मात्र एक 'Seen' से? क्या छोड़ देते हैं उम्मीद फिर कभी उत्तर पाने की? क्या दो इंसानों को जोड़ने वाली ये डोर होती है एक इंसान से भी कमज़ोर? ​कैसा सवाल है ये भला? ख़ुद के रिश्तों की ही जब करता हूँ छान-बीन, तो पता चलता है मुझे कि कितने ही संदेश ऐसे, कितनों के अनदेखे किए हैं मैंने। दुःख होता है ये सोच कर कि किस हालत में, किस तकलीफ़ में, किस वजह से भेजे थे वो सारे संदेश मुझे, और मैं अपनी ज़िंदगी में इतना गुम था कि नहीं निकाल पाया समय उन लोगों के लिए, जिनको कभी किया था वादा कि रहूँगा साथ में हर दम, हर वक़्त, बस एक मैसेज दूर। ​अब जब कभी पहुँच जाता हूँ वापिस अपने फ़ोन की उन गलियों में, और देखता हूँ उनका नाम टिमटिमाता सा, तो सोचता हूँ कि क्या हो गई बहुत देर? क्या अब ये हमारे बीच की खाई नहीं भर पाएगी फिर एक "Hi" से? क्या फिर से नहीं पूछ सकता हूँ मैं हाल-चाल उनके? फिर से कर सकता हूँ क्या वादा कि हूँ मैं साथ उनके, हूँ अभी भी यहीं, बस भटक गया था कहीं? और नहीं माँग सकता माफ़ी क्या एक बार? ​पर फिर याद आता है कि ये बात थी कितने ज़माने पहले की, और अब सिर्फ़ किया जा सकता है एक ही काम कि देखता रहूँ अपने फ़ोन की स्क्रीन, और सोचता रहूँ कि माँग लूँ माफ़ी तो सब हो जाएगा क्या ठीक फिर से? मिल जाएँगे ये लोग फिर से? मिल जाऊँगा मैं फिर ख़ुद से? मिल जाऊँगा क्या? ​~ शिवम गुप्ता©

Shivam Gupta

Kavita / Poem · हिंदी, उर्दू

ख़्याल

ख़्याल . . कभी-कभी अँधेरी रातों में सितारों की रोशनी में जब शब और सुबह के बीच मेरे तसव्वुर की उधेड़-बुन में मुझको आते हैं ख़्याल तो अपने को आलिम समझकर कवायदों का ज़ालिम समझकर इल्म की ख़ातिर ख़्याल मेरे चढ़ जाते हैं बहर की रस्सी को फाँसी बना कर। तड़पते रहते हैं सारी रात, जिन ख़्यालों में जलती है आग, जो बन सकते हैं दरिया किसी का, जो बन सकते हैं तिनका किसी का, जिनकी रातें उजाड़ कर सवेरा हुआ है वो एक ख़्याल मेरे मन में ठहरा हुआ है। चीखते रहते हैं हर सुबह मन में मेरे कि उतर जाएँ सफ़्हों पर ताकि उनकी रातें न हों बेचैन मेरी तरह, और फिर उतर पाएँ लोगों की ज़बान पर, ज़हन में, दिलों में और आखिरकार फ़ितरतों में क्योंकि आखिरकार कला और सुख़नवरी ही बचाएगी इस दुनिया को पामाली से। सोचता हूँ कि है क्या मन्ज़िल भी कुछ इन ख़्यालों की या मर जाएँगे मेरे अंदर रह कर ही ये सब एक दिन। क्या मेरा ज़ेहन कब्रिस्तान है उन ख़्यालों का जो कभी नहीं ढूँढ पाए अपना अगला मिसरा, जिन्हें मयस्सर न हुआ क़ाफ़िया, जो नहीं आ पाए बहर में कभी, जो कवायदों की उलझन में रद्द कर दिए गए। क्या इन ख़्यालों की मंज़िल नहीं कोई अब? नहीं बन सकता क्या इनके मायने से एक और ख़्याल पर फिर इसमें नया क्या है, पुराने ख़्यालों की लाशों से नए वाहीमा की पैदाइश करना जैसे हम खुद भी हैं ख़्याल किसी का, जैसे किसी के जाने पर किसी के आने पर किसी से रूठने पर किसी के मनाने पर पैदा होते हैं हम फिर से, एक बार, हर बार। तो क्या मन्ज़िल नहीं मेरी या ये भी सिर्फ़ एक ख़्याल है और ये सब सोचते-सोचते ख़्यालों के इस भँवर में, भटक जाता हूँ मैं तो नहीं लिख पाता हूँ कुछ, और कभी-कभी लिख देता हूँ सफ़्हों पर फिर वही बवंडर जिसमें कहीं फँसा हूँ मैं, और अब आप भी। ~ शिवम गुप्ता©

Shivam Gupta

Ghazal / Sher · हिंदी, उर्दू

पूछते है मुझको "तो क्या ही अलग है"?

पूछते है मुझको "तो क्या ही अलग है"? देखते तो है ये बंदा ही अलग है। बोलते है और कुछ, है दिल में और कुछ इनके चेहरे पे तो चेहरा ही अलग है। है बहुत धोया मगर निकला नहीं ये मेरे दामन पर तो धब्बा ही अलग है शहर में है मेरे झीलें तो कई पर हिज्र का इस दिल में सहरा ही अलग है कहती थी पागल क्या लिखता रहता है तू अब तू आ के देख जल्वा ही अलग है देखती है अस्ल तू, मैं देखता ख्वाब तेरी और मेरी तो दुनिया ही अलग है ~ अस्ल शिवम

Shivam Gupta

Ghazal / Sher · Hindi, urdu

मिज़ाज यूँ मिरा जनाब है, अज़ाब है

मिज़ाज यूँ मिरा जनाब है, अज़ाब है दवा के नाम पर शराब है, अज़ाब है ​फ़रेबकार हैं रफ़ीक़, इल्म है मुझे हरीफ़ सारे लाजवाब हैं, अज़ाब है गई है छोड़ कर जहाँ को दादी यूँ मेरी न दिल के दर्द का हिसाब है, अज़ाब है पढ़ा है जिसको सबने अपने ही तरीके से ये मर्द जात अज़ब किताब है, अज़ाब है ​जो शख़्स साथ है सहर भी और शाम भी वो कोई अस्ल या सराब है, अज़ाब है ~ अस्ल शिवम ​

Pulkit Agrawal

Kavita / Poem · Hindi

मैं गीत नया गाता हूं

मेरा दुखों में विश्वास नहीं, कमजोरी का आभास नहीं, प्रेम के पावन एहसासों को, मैं दुनिया को बतलाता हूं, मैं गीत नया गाता हूं | कैसा भी चाहे मंजर हो, कितने भी चाहे खंजर हो, अपने उसूलों की कसौटी पर, मैं अडिग रहकर दिखलाता हूं, मैं गीत नया गाता हूं | कैसी भी चाहे पीड़ा हो, बिरहा की ताप्ती ज्वाला हो, अपने कर्तव्यों के पथ पर, मैं आगे बढ़ता जाता हूं, मैं गीत नया गाता हूं | मरना बड़ा आसान है, जीना सुख दुख का नाम है, अपने संघर्षों के दियो से, मैं अखंड ज्योति जलाता हूं, मैं गीत नया गाता हूं | स्वयं को तरासो तुम, खुद का सामर्थ्य पहचानो तुम, अपनी शक्ति को साबित करके, मैं शंखनाद बजवाता हूं, मैं गीत नया गाता हूं |

Pulkit Agrawal

Kavita / Poem · Hindi

हर मौसम बरसात मिले

ऐसा तो संभव ही नहीं, की हर मौसम बरसात मिले, अपने मन की धूप मिले और अपने मन की छांव मिले | जितना भी चाहे मधुर शहद हो, नमक चाट के जाना होगा, अपने जीवन के कास्ट्तों को भी तुझको गले लगाना होगा | यदि अपनी बगिया के फूलों से तूने खुद को महकाया है, तेरे हिस्से के सूलो को भी तुझको ही तोः बोना होगा | जब मंजिल का आनंद तुझे घनघोर प्रशंसा देता है, तो राहो की ठोकर से भी तुझको हाथ मिलाकर चलना होगा | तुझको अगर निखरना है तो सूरज जैसा तपना होगा, माला फूलों की बनना है तो सुई धागों में पीरना होगा |

Source
Pulkit Agrawal

Kavita / Poem · Hindi

उसको भूलने का

ढूंढा हर तरीका उसको भूलने का, फिर हर तरीके से भूल आया उसको भूलने का | हर रोज आती है हर रोज सताती है, उसकी याद में ही भूल आया उसको भूलने का | न चाहता हु कुछ न मांगता हु कुछ, हर दुआओं में भूल आया हुस्को भूलने का | घुमा हर शहर हर एक गली-गली, उसकी गली में भूल आया उसको भूलने का | निकले जहा से वो गुल ए बहार की खुशबू, उसकी मदहोसी में भूल आया उसको भूलने का | भूल से भी भूल में मैं उसको भूA लता नहीं, खुदको भूलकरके भूल आया उसको भूलने का |

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